Monday, October 17, 2022

जीवन बस यही है

 आज एक टूटता तारा

मौन ही कुछ कह गया .…...

सांसें इसी तरह 

टूट के अनंत में 

विलीन होती है।

कल्पित अभिलाषा

और जिजीविषा 

सूक्ष्म काया में विद्यमान

अपना स्थूल पाने की

ललक में 

स्निग्ध नजरों से 

खोजती हैं सर्वत्र

अपनों की आहट

जिनको अपनी 

अभिव्यक्ति का मशाल देकर

स्वयं अदृश्य रहती हैं

ताकि जीवन की कुछ

पहेलियां हमेशा उलझी रहें

जिसको सुलझाने की कोशिश में

हर इंसान जीवन पर्यंत

भटकता रहे और 

अपना नाट्य क्रम जारी रखे।

जीवन बस यही है

यही जीवन है।

              रचना© मनोज कुमार मिश्रा

Friday, May 15, 2020

कुत्ता तो कुत्ता है

सीमा विवाद को लेकर कल दो कुत्तों में लड़ाई छिड़ गयी। एक ने दूसरे की गर्दन ऐसे दबोच ली मानो भीषण युद्ध की बिगुल बज गयी। लड़ाई पहले दोनों पंजों पर खड़े होकर शुरू हुई। फिर एक ने दूसरे को अपनी दाँव से पटक दिया।
ये मल्ल युद्ध इतना भीषण था कि मुहल्ले के सारे कुत्ते दौड़ते-भौंकते वहाँ पहुच गये और अपनी पूरी ताक़त उसको दबोचने में झोंक दी। घोंघियाने से शुरू हुई आवाज़ इतनी कर्कश होने लगी कि दो पैर का प्राणी भी बेचैनी में अपने घर से निकलने लगा। बाहर का कुत्ता मांसल होते हुए भी हिम्मत हार चुका था।

वो युद्ध बंदी की तरह अकेला मारे डर के अपनी पूँछ जहाँ तक बन पड़ा पेट के अंदर घुसाये जा रहा था। अगर स्वयं को भी पेट के अंदर छुपाने की जुगत वो जानता, तो वो आज सिकंदर था।

बीच-बीच में अपनी नुकीली दाँत से किसी कमजोर कुत्ते को डराने की कोशिश में स्वयं को संतुलित रखने की कला उसकी ताकत थी। शायद ऐसी नौबत उसके जीवन में पहले भी आ चुकी थी।

घनघोर लड़ाई और चिल्ल-पों ने मुझे भी घर से बाहर खींच लिया। मैं शर्मसार हो गया लोगों के कुत्ता हो जाने से। केवल कुत्ता ही वफ़ादार नहीं हो सकता, आदमी भी कुत्ता हो सकता है। लोग इस लड़ाई का आनंद ले रहे थे।

मैने डंडा उठाया और लड़ाई छुड़ाई। बहादुर कुत्ते मेरी तरफ गुस्से से देख रहे थे मानों मैंने किसी अपराधी को पनाह दी हो।

लड़ाई जबरन बीच में ही ख़त्म करवा दी गयी। बेचारा वो डरा कुत्ता भागकर मेरे दोनों पैरों के बीच में कूँ- कूँ करने लगा। उसकी साँसें तेज चल रही थी। पूँछ हिलने की रफ़्तार कुछ अप्रत्याशित थी।

पूँछ कुत्ते की ईमान है। पूँछ ही उसकी शान है। पूँछ की मेहनत से वह रोटी ख़ाता है। पूँछ से ही स्वमिभक्ति करता है। पूँछ से ही खुशी और पूँछ से ही भय व्यक्त करता है। ज़रा कल्पना कीजिए पूँछ विहीन एक कुत्ते की ! उसकी जिसकी आँखो में स्वमिभक्ति की चमक तो हो सकती है पर उसकी तीव्रता मापने का यन्त्र? ये तो उसकी पूँछ ही है। कटी पूँछ का कुत्ता उस ठूंठ पेड़ की तरह है जिसपर आँधियों का प्रभाव भी निःशेष होता है।
उसके अप्रत्याशित गति से पूँछ हिलाने की रफ़्तार ने मुझे मौन इशारा कर दिया कि इसे अभी सुरक्षा घेरा की नितांत आवशयक्ता है। मैने उसके माथे पर हाथ फेरकर आश्वस्त कर दिया कि अब डरने की कोई वजह नहीं।

आज उसकी इस दुर्गति ने मुझे बचपन की गलियारों में धकेल दिया।

मैं दस साल का था। गली के एक कुत्ते से मेरा अंतरंग लगाव था।. वो मेरा अभिन्न मित्र था। स्कूल के बाद बचा समय मेरा उसी के साथ बीतता। अपने भोजन का कुछ हिस्सा उसकी प्राण-रक्षा के लिए काफ़ी होता। ठंढ में मैं अपनी पुरानी कमीज़ उसे पहना देता। पर अगले दिन वह उसे नोच-नोच कर तार-तार कर देता। मुझे बहुत तकलीफ़ होती। पर क्या करते। नियती ने उसे वैसा ही बनाया था।

अक्सर उसके साथ घोड़ा-घोड़ा का खेल खेलने में मज़ा आता था। मैं उसकी पीठ पर बैठकर दोनों कान पकड़ लेता। वो भी कम चालक नहीं था।. जैसे ही मैं उसकी पीठ पर बैठता, वो ज़मीन में लोट जाता। और मेरा खेल बिगड़ जाता।

बड़ी अजीब विडंबना है। जब एक वफ़ादार मित्र था तब किसी दो पैर वाले मित्र की तलाश थी। आज अनगिनत मित्र हैं, पर किसी अजीज वफ़ादार की तलाश बदस्तूर जारी है।

समय पंख लगाकर उड़ता गया। मैं भी उसकी राह का रही बना रहा।. बचपन बीत गया। उन्मत्त उल्लास का समय बीत गया। अब बड़े हो गये। पर उस जीव से आत्मीय लगाव कभी कम नहीं हुआ।

घर से दूर रोटी के चक्कर में बिराने में समय बिताना पड़ता है। कुत्ते के लिए अब हमारे स्नेह का भी परिमार्जन हो गया।

......................रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, September 09, 2019

मेरे किरदार को तू भी पहन के देख जरा

हम दरिया हैं तूफ़ान से हरदम हैं रहगुजर
बिखर जाते हैं हवा में देवदार की तरह।

कहां किसी का छूटता है अपनों से वास्ता
गोया चला था साथ वो दिलदार की तरह।

किस्मत मेरे घर आती है चुपके से इस कदर
बच्चों से फैले अर्श पर रोशनाई की तरह।

किसी के वास्ते मन्नू कहां रुकती है ये दुनिया
तुम तो ठहर जा सुबह तक तन्हाई की तरह।

मेरे किरदार को तू भी पहन के देख तो सही
किसी गरीब के घर में ढकी रजाई की तरह।

                ..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Sunday, September 08, 2019

जिंदगी से कोई गिला नहीं

तुम अकेले फिर खड़े हो भीड़ में खोए नहीं
मशाल-ए-जश्न में कुछ तो धुआं हुआ होगा।

शहर की रोशनी बारिश में नहा के निकली है
कल अंधेरी रात में चुपचाप कुछ हुआ होगा।

उदास पन्नों पर कुछ गज़लें रख के सो गया
रात बस चलती रही खामोश कुछ हुआ होगा।

आसां नहीं है शहर में मुफलिस कोई आदमी मिले
चेहरे वो नहीं आदमी कहें इनको नशा हुआ होगा।

आंखे खुलती नहीं अचानक रात के आगोश से
सच अभी भी सोता है ख्वाब में कुछ हुआ होगा।

दरकते रिश्ते गांव के सुकून की अब हवा नहीं
शहर खुश है दुआओं में मुकद्दस कुछ हुआ होगा।

जंग जारी है अभी तेरे कोई सपने सजाता मैं
उम्मीद लिए चलता हूं नया कुछ हुआ होगा।

जिंदगी से कोई गिला नहीं जो मिला वो महफूज़ है
पत्थर घिसकर बुत बनाने का भरम हुआ होगा।

                       ..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Wednesday, September 04, 2019

जरूरी नहीं कि हर कहानी बोल के बातें करे

राख पलटते रहे कि कोई अदद ख्वाब मिले
उंगलियां सरकने लगी, सोई चिंगारी देखकर।

गुमसुम अकेले पेड़ ने आज हंस के मुझसे बात की
अर्से बाद आदमी ने आज अदब से चलना सीखा।

जरूरी नहीं कि हर कहानी बोल के बातें करे
अक्सर इशारों में कल की निशानी छोड़ जाते हैं

बढ़ो रुक-रुक के सही कदम-दर-कदम तुम भी
हम अकेले अब नहीं इक कारवां बनता चले।

शहर में खोया हुआ आज आदमी है बेखबर
सब अकेले भागते हैं गोया मुक्कदर ढूंढने।

एक गुनगुनी धूप की मुद्दत से मुझे तलाश थी
तुम ही पलट के हंस दो, सूरज निकल आएगा।

ताज पहने हो अकेले तालियों की तलाश में
आवाज दो सबको बुलाओ देखो कमाल भीड़ का।
                    ..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Saturday, August 31, 2019

जहां के पार की दुनिया

मेरे साख-ऐ-दयार में तेरे नज़्म अब भी जिंदा हैं
कभी इधर से गुजरो तो फिर वही गीत गाना।

फलक के सितारे तेरे शय को सलाम करते हैं
मेरी तो तुम रूह हो, खुद से जुदा करूं कैसे।

जिसके मोह ने तुमको कभी बेघर किया होगा
उसी के प्रेम ने मन्नू अभी तक जिंदगी बख्शी ।

कहा था दरिया मिलती है एक रोज़ किनारे पर
जहां के पार की दुनिया हमारा आशियां होगा ।

अगर पलटकर गिर जाऊं, तुम कंधे पर उठा लेना
बहुत मुश्किल है चलकर दरिया पार कर जाना।
                                              ..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या
ये हसरतों की दुनिया
ये नफरतों का बादल
उधार की ये दौलत
ये कश्मकश के लम्हे
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या
ये कागजों में उलझी
ये मौन में ही सिमटी
साये से बात करती
ये उलझे उलझे रिश्ते
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।
ये घूमता समय का पहिया
ये बेबसी का आलम
बेजान सी जवानी
ये बारिश का कहर होना
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।
ये खिले-खिले से चेहरे
ये हंसी खुशी की बारिश
चुपचाप मुस्कुराना
ये तालीम की दुहाई
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।
ये तेरा मेरा गाना
ये जहर का दोना
अंदेशों का शहर अपना
ये सुबकती सर्द रातें
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।
ये आंखों का लाल होना
ये करवटों का पहरा
गिनती में सबका जीना
ये कांच-सा दहलना
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।
ये बेपनाह चाहत
ये झुकी झुकी निगाहें
तेरे घर से झुक के जाना
ये आंगन का चांद होना
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या।

                         ..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, July 26, 2019

एक प्रार्थना

मोह, माया, विद्रूप काया
राग, विराग, लब्ध वीतराग
सब समर्पित है
तुम्हारी चरणों में !
बस एक बार माँ
मुझे पुकार लो !
अपने पास बुला लो,
अपनी छाँव में बिठा लो,
मेरा तन, मेरा मन
आकुल है, तुम्हारे आँचल की
शीतलता के लिए !
इस काया की भित्ति
अब मैली और
कषाय हो चली है ।
आत्मा छटपटाती है,
माया और काया की जंजीर
तोडना चाहती है ।

हे माँ !
मुझे बुद्धि दो,
मुझे ज्ञान दो,
मुझे दृष्टि दो ।
इस संसार की दग्धता का आभास
मैं मौन से कर सकूँ ।
मैं आत्म साधना कर सकूँ
मैं वैराग्य जीवन जी सकूँ
मैं निर्मलता ओढ़ सकूँ
मैं निर्लिप्त कर्म साधना कर सकूँ ।
प्रायश्चित से
इस निराकार आत्मा को
शुद्ध कर दो माँ  ।
पुनः इसे आपकी शरण में
शीघ्र लौटना है ।
हे माँ ! मुझे शक्ति दो !
कि अंतर्द्वंद्व के
कोलाहल को शांत कर सकूँ
कि जिजीविषा की तृष्णा को
शमित कर सकूँ
कि मानव निर्माण में अपना
सर्वस्व समर्पित कर सकूं ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Saturday, September 15, 2018

ऐसा होता है आत्मिक प्रेम

कतिपय प्रेम कहानियाँ
पूर्ण विराम के अपराह्न से
अपनी जीवन यात्रा
प्रारम्भ करती हैं ।

मौन ! असहज अभिव्यक्ति,
काल के गाल में कबलित,
समय के पाश में जीवित,
जागृत होती है
जिजीविषा की लालसा से
अनंत के स्पर्श से ;
अनाहत मन पिघलकर
मोम बन जाता है।

मौन की दरिया
एकाकी पथ पर
चलते चलते
समंदर बन जाती है ।

ऐसा होता है
आत्मिक प्रेम
जिसकी परिभाषा
शब्दों, व्यंजनाओं, विन्यासों
और मन-मुदित आह्वलाद की
छाया से परे है ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा
                     

Monday, July 30, 2018

चाँद ! तुम आकाशीय पिंड हो

चाँद !
तुम अब
अपने उपमानों के
एकमेव अधिष्ठाता नहीं;
बल्कि आकाशीय पिंड हो।
पृथ्वी लोक का
निःशेष भ्रमण ही
तुम्हारी नियति है।

तुम्हारे कथा की रफ़्तार को
लोग शनैः-शनैः
तिरोहित करने लगे हैं।
खगोलीय चपलतायें
तुम्हें निगलती-उगलती
रहती हैं
सांप-छछूंदर की नाई।

धरावासियों की
अनगिनत मौन संवादों
और संवेदनाओं को
अपनी मुखरता में समेटकर
रोज़ आते-जाते हो।
सिलवटी साँसों के
उच्छावासों से आंदोलित
निश्छल और निर्विकार,
मानवीय भूलों की तरह,
तुम्हारा निरंतर होना
जगती को सुकून देता है।

भावों और शब्दों के पुजारी
अब भी तुम्हारे नाम का
ऋषियों की तरह
होम-जप करते हैं।
हमारा-तुम्हारा संवाद
किसी कवि के
मौन स्वीकृति का
मोहताज नहीं।
जिसे संसार की
तपिश को नंदन वन में
शीतल करने की
अभिलाषा है, वही
तुम्हारे दाग पर
ठिठोली करता होगा।

कौन जाने
कोई आकाशीय घटना
तुम्हारे अंतर्द्वंद्व की
एक सहज नवीन
पटकथा लिख दे।

इस पार
चाँद तुम हो, नभ है,
उस पार
न जाने क्या होगा।
रागों का वदन विदीर्ण हुआ
वितरागी मन का क्या होगा
जिस राह चलो तुम
मिल लेना
है मृदुल मनुज की अभिलाषा।
जीवन है उठना-गिरना
पलती इसमें कोमल आशा
तुम आओ आकर गले मिलो
है शेष यही एक अभिलाषा।

..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Wednesday, August 23, 2017

कल फिर सुबह होगी

मेरी बस्ती के लोग
जियें तो कहें कि दर्द किधर है ।
रुक-रुक के सांसों का आना-जाना
और उधार की कोरी जिंदगी
सब समेटे हैं अपनी चादर में ।
बस दिखाने को दो पैनी दांतें
अधरों के बीच समेट कर
बमुश्किल रात और दिन
दिन और रात की पहरें गिनते हैं ।
कहो कि कल फिर सुबह होगी
और दिन निकलेगा ।
अंधेरों के प्रलय जाल का
काल कबलित होना
अवश्यम्भावी है ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Wednesday, July 13, 2016

हम हकीकत जानते हैं.......

थक गये रिश्ते चलकर बहुत? उन्हें आराम दे दो
वासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

ख्वाहिशें जलती रहीं सुनसान दर पर इस तरह
न हम किसी के हो सके न कोई हमारा हुआ।

लड़ लिया खुद से बहुत अब और ना हो फासला
जीत कर ही खो दिया सब, हारने का क्या गिला।

साफगोई कभी ऐसी है कि हँस के भी रो देते हैं
किस्मत का खेल है कि पा कर सब खो देते हैं।

कभी बिखर के उग जाऊँ तो ना कहना स्वार्थी
जग के संभाला हैं आँखों में बीज एक मेहराव की।

हम हकीकत जानते हैं वृक्ष के फैलाव का
हौसले में लिपटी है बहती गति सैलाब की।

..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

बारिश से वार्ता

बारिश !
तुम्हारी बरसती बूंदों ने
देखो ये क्या कर दिया !

चिड़ियों का घोसला
उनका पंख, उनकी चोंच
गीला कर दिया
उनके पेट पर
पत्थर रख दिया
कीट-पतंगों को
निःशक्त बना दिया ।
चीटियों को ऐसे बहा ले जा रहे हो
मानों ताल में निर्वाध तैरती है
कागज़ की छोटी नाव !

गलियों में, घरों में, मुहल्लों में,
देहरी पर तुम्हारा आतंक
चहुंओर विद्यमान है !

तुमने देखी है उन आँखों को
जो कई रातों से उनींदी हैं?
नहीं न ?
उनमें तुम्हारी बूंदें पथरा गयी हैं !
क्यों घूम फिर कर उसी गली में
पागल प्रेमी की तरह जमे हुए हो?
बरसना ही है तो वहाँ बरसो
जहाँ कोमल कलियाँ
सर पटक-पटक कर
तुम्हारा राह देख रही हैं ।
तुम्हारा इंतजार ये निराश पेड़
गुम हुए सगे के वियोग की नाईं
एकांत मौन में कर रहे हैं ।

बरसना ही है तो नदियों में,
झीलों में, खेतों में, सागर में,
मुद्दत से सूने पड़े मन में
बरसो न झूम कर ।

तुम्हारे इतराने ने
हमारे अजीज को सड़क पर
बेनूर बना दिया है ।

तुम तो हठी बाला हो
वही करोगे जो मन कहेगा।
तुमने किसी की सुनी है
जो मेरी सुनोगे?

अरे !
बूंदों की रफ़्तार थमने लगी।
बदली की ओट से
देखो सूरज झांकने लगा।
डूबी बस्ती में जिजीविषा का
कोलाहल तैरने लगा।
जीने की चाह ने
फूटे छप्पर पर
हलचल की नींव रख दी ।

हम आज को
कल के भरोसे नहीं छोड़ सकते।
जीने की मुमूर्ष अभिलाषा ही
मानव की पैनी शक्ति है
जहाँ निर्माण और विध्वंश
दोनों की अविरल गति
साथ-साथ अठखेलियां करती हैं ।

..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Thursday, June 09, 2016

अद्भुत है भारत तेरी विरासत!

आज भीख मांगने वाली एक नन्हीं बाला को इलाहाबाद के यमुना नदी में एक रूपये का सिक्का बड़ी श्रद्धा से डालते देखा।
बात ये नहीं कि उसने नदी में सिक्का डाला।
बात है, बड़ी जतन से जमा किया धन का मोह त्याग !
तिल-तिल मरना पड़ता है एक-एक सिक्के के लिए। 
अपना जमीर मारना पड़ता है दूसरों के आगे हाथ फैलाने में। 
और फिर भी माया का दान बिना प्रतिदान की इच्छा के? निःसंदेह स्पृश्य है!
हर क्षण हम जिसे जोडते जाने की तमन्ना में समग्र सांसारिक कुचक्रों का जाल बुनते जाते हैं, उसका त्याग !
हे ईश! तुमने इतनी शालीनता उसकी चुप्पी में क्यों भर दी है?
उसका जटिल मौन उद्वेलित करता है।
काश! हम स्वनाम धन्य जन उसकी विराट सहनशीलता को भावो से स्पशॆ कर पाते ?
अद्भुत है भारत तेरी विरासत!

..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

शेष होती है तो जीवन की सांसें............

जीवन अतृप्त से शुरू होकर अतृप्त पर ही समाप्त हो जाने वाली वृक्ष गाथा है। कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होगी इसका भान तक नहीं हो पाता। 
अगर हुआ भी, तब तक काया जीणॆ हो चुकी होती है। जीवन वीथि पर मोह अपने अंक में इस तरह जकडे रखती है कि हम ये जान नहीं पाते हमारा ध्येय क्या है।
सांसें हमें जिस राह खिंचती जाती है, हम खिंचते जाते हैं ।
चाह कभी शेष नहीं होती। शेष होती है तो जीवन की सांसें............
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, June 06, 2016

आज स्थिर है शैव बनकर

तपती दोपहरी में
बादल के किसी कोने से
स्पर्श की स्पंदित बूँदे
अनायास ही
रोम रोम गीला करता है।
उच्छवास
तरंगित जीवन गाथा का
एकांत गीत से
झंकृत है।
तन का मोह
मन की माया
सब तुम्हारी
दहलीज पर
रखकर खाली हाथ
लौट आया।
इसे सम्मान से
समेटकर कहीं
बंद कोठरी मे
कल के लिए
सहेज लेना
जीवंतता की
धरोहर होगी।
कौन जानता है?
आज का बीज
कल अंकुरित होकर
वृक्ष न बन जाय !
कौन जानता है?
सुवासित कन्दराओं में
पत्थरो का सीना चीरकर
किंचित कोई फूल
हँस न दे !
आँख की बूँदों का भार
नदी में बहती रेत है;
तल में चुपचाप
सरकती जाती है।
मौन तृष्णा भटक कर
संवाद में अर्थ की
परिभाषा तलाशने
लगती है।
हम कल की तस्वीरों में
रंग भर रहे हैं;
आज स्थिर हैं
शैव बनकर
शीतल शिलाओं पर
गहराती संवेदनाओं में
धर्म का मर्म
समेटे हुए।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Tuesday, May 31, 2016

आसां नहीं होता दामन बचाना

कहाँ सज्दे में सर झुके तुम्ही कह दो  तो अच्छा है
मेरी आंखे तो झुकती हैं हर नम आंखों को देखकर।

तेरे रूखसार की रोज बंदगी मेरे शय में अब भी शामिल है
जिस हाल में हों मुस्कराया तेरी नूर-ए-रहमत देखकर ।

बहुत ही मुश्किल है जनाजा उठाकर फिर सुला देना
आसां नहीं होता दामन बचाना मज़हबी हंसी देखकर ।

तेरे शहर में कैसे सो जाऊँ जमीर अपनी टांगकर
क्या गुजरेगी उन फकीरों पर हमको नशे में देखकर ।

बिखर के जीना औ' जी कर बिखरना आसां नहीं है मन्नू
तंज कसते हैं बेवजह लोग मुफलिसी रूखाई देखकर ।

समेट लाता हूँ अपने दामन में उधार की कुछ बची नज्में
कल हों न हों कह नहीं सकते हालात-ए-मंज़र देखकर ।

बहुत जी लिया यहाँ रफ़्तार-ए-नब्ज गिन-गिन कर
कि मर भी नहीं सकते खुदाया आहट तेरी देखकर ।

मिला है खाक में नफरत अदब से दरिया और दरख्तों का
साहिल को किनारे जाने दो लहरों का कलंदर देखकर ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

अधूरा सपना


सुबह की बारीश ने
घोल दिया अधूरा सपना ।
उनींदी आँखों में
चुप्पी उतरने लगी
सूरज के साथ-साथ ।
अधूरी कहानी गीली घास पर
रेंगती ईल्ली-सा
अपना मुकाम ढूँढती है।

अनजान चेहरे बिदककर
गहराती आद्रता में
अपना ठौर तलाशने
आहव्लादित पतंगों-सा फुदकते हैं
इधर-उधर जलती लौ के इर्द-गिर्द ।

सपना खो गया है ।
नींद अधूरी है ।
नीम का गीला गाल
आईने में नहीं समाता
शीशम तिरोहित है
वृक्षों की सभाओं में
आम गुमसुम है भीगकर
मासूम बादल के नीचे
अगली रात का इंतजार
चाँद के साथ बाकी है
कि सपना पूरा हो
घरौंदो में मढ़े रोशनदान-सा
कि हवा आती-जाती रहे
स्वछंद बच्चों की किलकारी जैसी ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, May 23, 2016

जीवन अगर क्षितिज होता

जीवन अगर क्षितिज होता
सार मिलन का तय करते
चन्द्र वलय-सा पुलकित हर्षित
चारू विनय कुसुम खिलते ।
मोहक प्रभा विहंगम तान
निशा हिमकर का प्रेम वितान
सरपट ढलता पहर पलक-सा
एक भूल नित-नित अज्ञान ।
तुम चित्र बना रंग भरती जाती
स्वप्नलोक की रचना जैसी
परम प्रासाद लोक में अविरल
धवल दिव्य प्रवंचना जैसी ।
हम धरा धाम के हैं वासी
कोई मधुर गीत ना गा पायें
आओ अनन्त में कल्पना का
एक नवल सुकोमल नीड़ बनायें ।
कौन जानता चंचल जीवन
किस बीहड़ में मोड़ेगा
कल की सांसें आज ही गिन लें
समय कहाँ कब छोड़ेगा ?
चंचल किरणें थिरक-थिरक
कुछ नाद मनोरम गा पायें
जिस राह चले हम दिवा-स्वप्न में
सुप्त मनोरथ जग जायें ।
हाँ! मन का हाला मतवाला
आज चाँद पेड़ से मिलने आया
कुछ वह विनोद में, मैं मुखरित
मिलकर चादर सिलने आया ।
हे मनुज! तुम्हारी रचना ने
कण-कण में मंगल गाया है
इह लोक व्यथा अब व्यर्थ न हो
घर मिलने कानन आया है।
चल, हमें भुलावा देकर ले चल
मौन रथों पर तम के पार
जहां मिलन की शाश्वत गाथा
गाता है सुंदर सुकुमार ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, May 06, 2016

चाँद! तुम तरल हो रहे हो

चाँद !
तुम रुई-सा मुलायम
और पानी-सा
तरल हो रहे हो
गीली मिट्टी जैसे
धीरे धीरे सरकना
सीख लिया है ।
उष्ण रातों में
मंद मीठी पछुआ वयार की नाईं
शीतल सिलवटी गालों पर
एक सुखद एहसास की
नजरें फेर देते हो ।
धुप का धुआं जैसे
दीपक की लौ से लिपटकर
अपना अस्तित्व बोध
खोने लगता है
मेरा मृदुल शुन्य
तुम्हारे विराट में
शनैः शनैः घुलने लगा है ।

तुमने  कोमलता, निर्भीकता 
पाताल की गहराई और
सागर का विस्तार कैसे पाया?
एक बात मुझे भी समझाओ (समझाओगे?)
फूलों की लालिमा-सी शर्म
जीवन की गहरी धुंध में भी
हँसते-हँसते वक़्त को 
कुरेदना,
अट्टहास करना,
बरसते बादल को एकटक
शांतचित्त कोने में छुपकर
निहारना
कहाँ से सीखा ?
शक्तिपुंज की तरह
चतुर्दिश सुख की
मखमली चादर फ़ैलाने का
गुण कहाँ से पाया ?

तुमको शायद समय ने 
स्त्रीत्व सीखा दिया 
और मैं ?
समय को पकड़ने की चाह में
कई हिस्सों में बंटता चला गया
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा