Tuesday, February 09, 2016

जाड़े की धूप

जाड़े की धूप पुराने प्रेमी जैसी हो गयी
छत के मुंडेरे पर इशारे से बुलाता है !

कभी गुमसुम, कभी गुनगुन, कभी आँखें दिखाता है
कभी रूठी बुआ-सी चादर लेकर सोने जाता है !

हम ढूंढते हैं फुर्सत में कहीं उसको रिझाने को
कभी आता, कभी जाता, कभी गुमनाम रहता है !

तुम्हारी मिटटी जैसी फितरत है, जिधर चाहो सरक जाओ
कभी घर में, कभी छत पर, कोई चेहरा लुभाता है !

आ जाओ प्रिये!  दोपहर है, घर में हम अकेले हैं
पता मेरे मोहल्ले का यहाँ हर जन बताता है !

सफर तेरा जुनूनी है, हम कहें तो क्या कहें
तेरा आना बहुत जरूरी है, पर जाना बहुत सताता है !