Friday, August 30, 2013

आत्मकथा गुलाब की


 
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काँटों की सरहद पर

अधखुले अधर किए

बेगुनाह, बेफिक्र, उल्लासित गुलाब

सिर झुकाए और उठाए

धीरे-धीरे झूम-झूम कर

मूक.....

अपनी आत्मकथा सुनाता है.

और जीवन के बसंत का

प्रतीक बनकर

दो क्षण की साझेदारी से

हँसते-हँसते

कुछ देकर, बिन पाये

बिलखते हुए

अपनी जीवन लीला

शेष कर जाता है.

और छोड जाता है

अपनी पवन स्मृति

सूखे अस्थि पंजर के रूप में,

जिसको कि हम उठाकर

एक बार फिर 

फेंक तो सकें, नोच तो सकें

ताकि पुनः

नवजीवन की आशा

पानी के भंवर की भाँति

एक बार फिर से

विलीन हो जाए.

जब कब्र की तह से कुलबुलाती आत्माएँ

अपनी पहचान की खोज में

निरीह आँखों से देखती हैं,

और शब्दों का रूप

गूंगों की तरह घोंघियाती हुई

दस्तक देकर हमें आंदोलित करती हैं,

तो हम अनसुनी, अनदेखी निगाहों से

एक कदम और आगे बढ़ जाते हैं.

क्योंकि........

हम अब बुद्धिमान हैं,

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति,

और संसार के बेहतर निर्माता

जिसके मस्तिस्क में अन्वेषी

बुध्धि तो है

पर सिने में मृदुल हृदय नहीं,

जिसके पास निर्माणकारी हाथ तो है

पर कला परखी भावना नहीं,

और जो सुंदर तो है--

लेकिन अभिमानी!

----मनोज कुमार मिश्रा

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Thursday, August 22, 2013

वक़्त चलता है या कि थम गया !

चिरागे रौशनी मुराद की, बयाँ मय्यसर नहीं होता

रुलाया उसको होने ने, होता वो तो क्या होता ?

बुझ गयी है लौ, शमा रौशन होने से पहले ही
बुझाया उसको खोने ने, न खोता वो तो क्या होता ?

 

आज चाँद है फलक पर, और फसाने भी अब तो रुसबा हैं
मिटाया उसको छूने ने, न छूता वो तो क्या होता ?

 

ज़ुबाँ चुप हैं, आखें नम हैं, वख्त-ए-नज़ारा कुछ तो ऐसा है
हँसाया उसको फ़ितरत ने, न हँसता वो तो क्या होता ?

जहमते शोख की बंदिशे अनगिनत हैं इधर जालिम
रोते हम तो हँसते वो, न रोते हम तो क्या होता ?

माना पत्थरों ने फ़र्ज़ निभाया है, ठोकरें देकर भी, बुत बनाकर भी
मेरी रुखसत पे गर वो ना आये, सुकुने रूह क्या होगा ?

ए आसमां ! मुझे अब तू ये बता, वक़्त चलता है या कि थम गया
सब खामोश क्यूँ हैं ? नज़रें झुकी हैं ! या तेरा रंग बदल गया ?

                                                                ----म कु मिश्रा

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