Thursday, August 22, 2013

वक़्त चलता है या कि थम गया !

चिरागे रौशनी मुराद की, बयाँ मय्यसर नहीं होता

रुलाया उसको होने ने, होता वो तो क्या होता ?

बुझ गयी है लौ, शमा रौशन होने से पहले ही
बुझाया उसको खोने ने, न खोता वो तो क्या होता ?

 

आज चाँद है फलक पर, और फसाने भी अब तो रुसबा हैं
मिटाया उसको छूने ने, न छूता वो तो क्या होता ?

 

ज़ुबाँ चुप हैं, आखें नम हैं, वख्त-ए-नज़ारा कुछ तो ऐसा है
हँसाया उसको फ़ितरत ने, न हँसता वो तो क्या होता ?

जहमते शोख की बंदिशे अनगिनत हैं इधर जालिम
रोते हम तो हँसते वो, न रोते हम तो क्या होता ?

माना पत्थरों ने फ़र्ज़ निभाया है, ठोकरें देकर भी, बुत बनाकर भी
मेरी रुखसत पे गर वो ना आये, सुकुने रूह क्या होगा ?

ए आसमां ! मुझे अब तू ये बता, वक़्त चलता है या कि थम गया
सब खामोश क्यूँ हैं ? नज़रें झुकी हैं ! या तेरा रंग बदल गया ?

                                                                ----म कु मिश्रा

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