Wednesday, August 23, 2017

कल फिर सुबह होगी

मेरी बस्ती के लोग
जियें तो कहें कि दर्द किधर है ।
रुक-रुक के सांसों का आना-जाना
और उधार की कोरी जिंदगी
सब समेटे हैं अपनी चादर में ।
बस दिखाने को दो पैनी दांतें
अधरों के बीच समेट कर
बमुश्किल रात और दिन
दिन और रात की पहरें गिनते हैं ।
कहो कि कल फिर सुबह होगी
और दिन निकलेगा ।
अंधेरों के प्रलय जाल का
काल कबलित होना
अवश्यम्भावी है ।
........रचना मनोज कुमार मिश्रा