Saturday, March 05, 2016

आँखों को कब अपना आसमां बनाता है धुआँ

हँस के जो बाँट दिया अपने कशमकश को
दुनिया बदलती गयी फिर घर के चराग से ।

कितना अजीब है मन्नू कि ये ग़ज़लें फ़क़ीर हैं
आसमां, तेरी जमीं पर बची अब ना जमीर है ।

क्यों न रंग दूँ तेरे चेहरे को सुर्ख, फागुन में
ऐ चाँद! कि तुझको ख़ुशी देकर पाया है ।

नज़रें चुराकर चुपके से फिर हवा घर में आ गयी
सोये आग को देखो अभी थपकी देकर जगा गयी।

कहो कि चराग जलते हैं मेरे घर से तेरे शहर तक 
ये तो आदमी है कि अंधेरों का शौक रखता है।

तुम्हारे शहर के लोग भी ताज को तरसते हैं
इस शहर का क्या, यहाँ ताज कभी बिकता नहीं।

कभी मिल गए तो खुशियों को तुम भी थोड़ी जमीं देना 
अभी उम्मीद की तपिश बाकी है इस फैले दयार में ।

तेरी आँखों का जादू है कि वो जब भी मिला बरस गया 
वरना आँखों को कब अपना आसमां बनाता है धुआँ ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, February 15, 2016

एक वो था जिसने जान दे दी

जीवन की विविध राह में
मेरे पांवों का तरंग
चट्टानों से टकराकर
झनझनाती लहरों की झाग में
अस्तित्व खोता भाव का कदम
आगे बढ़ता है
पर चकनाचूर होकर
उन लहरों की कतारों से
लौटती ध्वनि
भुला देता है वो पुराने निशान
जो धरोहर है विरासत की
और अब डूबने को है
बिन पतवार की नाव ।

अरे ! सोये हो आँखे मूंदकर
किस धुंध की तलाश में ?
ले गया तुम्हारी माँ का चीर
वो काला अजनवी
अपनी झोली में समेटकर ।
अब तो जागो
अब तो आओ
धूमिल विवेक
फिर से झकझोरकर
जागृत तो कर आओ ।
जिसने तुम्हारे ह्रदय-रन्ध्र में
दो बून्द लाल खून दिया
कफ़न को दो गज कपडा
और जलने के लिए
दो बांस जमीन
जिसके कलेजे पर कूदकर
सर के बाल सफ़ेद किये
उसी को तुमने गाली दे दी ?

हाय रे मानव !
तुम्हारी भी अजब कहानी है
 मरते हो तो आँखें मूंदकर
और मारते हो तो विद्रोह से ।
एक वो था जिसने जान दे दी
अपनी माँ के लिए ।
और एक तुम निकले
जिसने बेच दिया उसको
सिर्फ दो कौर मांस के लिए ?
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Thursday, February 11, 2016

मुझे आज़ाद कर दो

लहरों के बीच बना 
अल्हड घरौंदे-सा
आज मन लगता है
किसी के लिए मस्ती 
किसी के लिए बस्ती 
बनकर घूमता हूँ
अपने ही शहर में !

सांसों की जद्दोजहद
सर्द रातों में बंद नाक-सी
लगती है !

बचपन में नंगे बदन 
उन्मत्त धूल में लोटना
और आँगन की देहरी पर
घंटों रोने जैसा रोज़
दिन बीतता है !

लो ! चुपके से बसंत आ गया !
कोयल की प्रणय कूक
और बगुले का जटिल मौन
अब मुझे नहीं रिझाता ।
मैं खोज रहा हूँ उम्मीद 
रेत में अकेले बैठकर
कल को हँसकर जीने के लिए !

मेरा क्या है ?
मैं तो किसी कंधे पर
अपनी गर्दन झुका लूंगा ।
मैं तो परेशान हूँ
तुम्हारे सजीव कल के लिए ।

तुम आओ
उठा ले जाओ
अपनी धरोहर
जिसको साल-दर-साल संभाला है
मैंने मन की पेटी में बंद करके ।
मुझे आज़ाद कर दो ।
अपनी सीमायें मुझे
फिर से लिखनी है
किसी जवान सैनिक की तरह !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Wednesday, February 10, 2016

नियति की दुविधा

समय के सम्मान ने
तुझे मौन मूर्ति से
चंचल गुड़िया बना दिया
और हम उसकी शिलाओं को
खरोंच कर भी अपना नाम
नहीं लिख पाये !

नियति की दुविधा तो देखो
कि नदी के दो किनारे
आज बात करते हैं,
हँसते-खिलखिलाते हैं,
मौन साधना भी करते हैं,
फिर जानी-पहचानी राह चल देते हैं !

कल इसकी फेनिल प्रवाह ने
किनारे का गाँव तबाह किया था
खेतों में रेत भर दिया था
सोना उगलने वाली मिटटी को
दलदल बना दिया था
और जीवन की मुमूर्ष अभिलाषा को
चुपचाप डुबो दिया था !

आज हम जीवन ज्वार के 
उस किनारे पर खड़े हैं
जहाँ से प्रदीपन मीनार की
मस्तूल साफ दिखाई देती है
पर कल की तस्वीर नहीं !

हम बसते जा रहे हैं
कभी इस गली, कभी उस शहर
कभी इधर, कभी उधर
कभी यहाँ, कभी वहां 
दिशाहीन परिंदों की माफिक !

अब जाने दो इन बातों को !
ये समय है ! 
न हमारा, न तुम्हारा
न काल का, न मलाल का
न जीत का, न हार का
न कल का, न आज का 
चलना ही इसकी मर्यादा है !

चलो मंदिर के घंटे को आज
साथ-साथ बजा आएं 
सोये मूर्ति को फिर से जगा आएं 
मस्जिद के अजान पर
सज्दे में सर नवायें
कल हम कहाँ होंगे, तुम कहाँ !

बिखरे शब्दों की दस्तूर ही
हमारी पहचान है 
किसी रंगमहल की दीवारों पर
हँसती रंगीन चित्रकारी जैसी
जिसपर कोई बेनाम चित्रकार
कल कुछ रंग उकेर आया था !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Tuesday, February 09, 2016

जाड़े की धूप

जाड़े की धूप पुराने प्रेमी जैसी हो गयी
छत के मुंडेरे पर इशारे से बुलाता है !

कभी गुमसुम, कभी गुनगुन, कभी आँखें दिखाता है
कभी रूठी बुआ-सी चादर लेकर सोने जाता है !

हम ढूंढते हैं फुर्सत में कहीं उसको रिझाने को
कभी आता, कभी जाता, कभी गुमनाम रहता है !

तुम्हारी मिटटी जैसी फितरत है, जिधर चाहो सरक जाओ
कभी घर में, कभी छत पर, कोई चेहरा लुभाता है !

आ जाओ प्रिये!  दोपहर है, घर में हम अकेले हैं
पता मेरे मोहल्ले का यहाँ हर जन बताता है !

सफर तेरा जुनूनी है, हम कहें तो क्या कहें
तेरा आना बहुत जरूरी है, पर जाना बहुत सताता है !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, February 05, 2016

सरकती जिंदगी कहाँ पटकेगी अब नहीं मालूम

किस-किस नगर की राह से गुजरा हूँ तेरी तलाश में
इल्म कहाँ था कि मेरी साख-ए-किस्मत ऐसी होगी !

बिखरी फलक की चादरें यहाँ से धुंधली दिखती हैं
एक शम्मा तो जलाओ कि जमीं ही रोशन हो जाए !

आसमान के कतरों में आज धरती-सी बड़ी दरारें हैं
सूरज भी छुप के आदमी का घाव सहलाता रहा !

करें इनायत किसकी यहाँ, हर सख्श नशे में धुत्त है
खुद में खुदा मशरूफ है, हम फिक्र किसकी करें यहाँ !

जुबाँ चुप है, नजरें खामोश हैं, औ' बंदिशें नूर हो गयीं
हम कहें तो क्या कहें, अब सितारे ही बात करते हैं  !

तुम हो तो हम हैं, हम नहीं होते तो अच्छा था
परदे में  रह नहीं  सकते, अगर होते तो अच्छा था !

कसम इस होने का बयां मय्यसर भी नहीं होता
बहुत कुछ बोलने की भी कोई सजा होती तो अच्छा था  !

सरकती जिंदगी कहाँ पटकेगी अब नहीं मालूम
न हो मालूम तो अच्छा है, पता होता तो मुश्किल था !

चलो एक राग गाते हैं अब दुनियां को हँसाने का
वो भी हँसते, मैं भी हँसता, सब हँसते तो अच्छा था !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Thursday, February 04, 2016

कहाँ गए बचपन के वे दिन

कहाँ गए बचपन के वे दिन
कुत्ते बिल्ली तितली मोर
रवि-शशि से आँख मिचौली 
खग-मुर्गों का युगल भोर ।

जब बन्दर वाला आता था
कोई सुन्दर गीत सुनाता था
डमरू बजा-बजा बन्दर का 
मोहक नाच दिखता था ।

उनका डंडा, इनकी गिल्ली
एक किया सब बारी-बारी
छुप गए धीरे भाग खड़े हो
ढूंढ मरी अम्मा बेचारी ।


धूल उड़ाना, मौज मनाना
था केवल मस्ती का सार
वही आज़ादी फिर से आती
फिर से पड़ती कोमल मार ।

बड़े हुए हम, हुए सुशोभित
रजनीगंधा, द्रुमदल में
मान मिला, अपमान मिला
धरती और अम्बर तल में ।

कोई कहे तू ले लो बचपन
क्रय कर लूंगा 'नाम' से
बचपन का संग्राम भला है
यौवन के अरमान से ।

पैनी बुद्धि, मोटी शक्ति
धन दौलत सब पलना है
जिसे देख लो रो-रो कहता
आज नहीं कल जलना है ।

हाय ! पुराना बचपन भोला
लौट नहीं फिर आएगा
हड्डी-हड्डी तोड़-फोड़कर
अंत समय ले जायेगा ।

हंसकर आना, हंसकर जाना
अगर यहाँ हम सीख पाते
धरा नहीं यह स्वर्ग कहाता
गर हिल-मिल कर हम रह पाते ।

जब अंत समय आ जाता है
मानव पहले घबराता है
स्मृति जीवन की हो धूमिल
आँखें फिर तब मूंद जाता है ।
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Tuesday, February 02, 2016

नदी के किनारे बैठा रेत का एक कण !

दीवार से टकराकर
लौटती घायल प्रतिध्वनि
हवा की तेज रफ़्तार में
अपना अर्थ स्वयं आत्मसात करके
नियति के दरवाजे पर दस्तक दे,
इंसानियत की आत्मा का जर्रा-जर्रा
सकते के आलम में थर्रा जाता है।

गहरी धुंध की चौड़ाई से
एक क्षीण, मद्धिम, पीली रोशनी
अपनी अस्मिता की सार्थकता के लिए
जगती के सामने आँखे फाड़कर
तिमिर का मौन भंग करता है,
आने वाले हरेक राहगीर को
अपने कल का इतिहास दिखाता है,
और कहता है--
मैं एक जीवंत संवेदना का
जागृत प्रतिरूप हूँ
जिसकी परछाई का स्वरुप टटोलना
अगर तुम्हे स्वीकार है तो
उसे देखो-- उफनती नदी के
एकांत किनारे पर बैठा
रेत का एक कण !
अपने अस्तित्व के लिए वह 
अकेले प्राणपण से जूझ रहा है ।
पहर भर बाद 
असीम जलसमाधी में विलीन होकर
उस अनंत सागर की एक
शाश्वत कहानी बन जाएगा !

जीवन इसी अनंत में बिखरी
पल-पल की मुखरित संवेदनाएं हैं
जिसका आकार सूक्ष्म से शुरू होकर
विराट की ही तो जलसमाधि है !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, November 02, 2015

चाँद! तुम हर रोज आना

चाँद कल रात मेरी खिड़की से
फिर झाँक रहा था
कुछ कहने की कोशिश में
मेरी तरफ चुपचाप टकटकी लगाए.
काल के चक्र ने मुझे
चैतन्य कर दिया.
उसकी हल्की मुस्कान
वर्षों पुरानी उस इमारत की याद दिला दी
जिसके कंगूरे पर चढ़कर
एकांत में उससे कुछ पल
अपने मन की बातें की थी.
हमारे एकांत की उम्र अब बड़ी है.

जीवन हमें घसीटकर 
बहुत दूर ले आया है.
फिर भी हम ठूंठ पेड़ की नाईं 
झंझावतों को चिढ़ाते हुए
निर्भीकता से खड़े हैं
सड़क पर पड़े उस भिखारी की
दाढ़ी में रेंगती जूँ की तरह
जो लाख कोशिशों पर भी अपना
अस्तित्व खोने को तैयार नहीं.

समय का फेनिल प्रवाह 
अब मुझे चिढ़ाता है,
कल की याद दिलाता है.
असीम जलधारा के प्रबल वेग में
अकेला धकेल देता है.
मैं निडर मछुआरे की तरह
रात के घुप्प अंधेरे में भी
तैरने को तैयार हूँ
वर्षों पहले की तरह.

चाँद! तुम हर रोज
हमारी खिड़की पर आना
बातें करना
थोड़ा मुस्करना !
कल सुबह गली के बच्चे
जब किलकारी मारकर
खुशियाँ मनाएँगे
तो दुनियाँ खुद-व-खुद
जान जाएगी क़ि तुम्हारा आना
और अपनी स्मृति छोड जाना
कितना सुखद और रोमांचकारी 
रहा होगा ढलती निशा के 
सुखद स्वपनों के साथ !    
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा                 

Thursday, September 10, 2015

चल देख दुनिया का तमाशा


जिंदगी की राह जब हो जाए गर कभी कठिन
तो टूटते तारों में फिर से कोई रंग ढूंढीए

राह किसी मोड़ पर जब अर्थ बदलने लगे
पत्थर  फेंको भंवर में कि डूब जाएँगे

जिंदगी जिस दिन मुझे चौराहे पर सोयी मिली
हाथ का मशाल तब से और तेज जल गया

दस्तक हुई या तीर चला ये तो बताइए
आपके रहमत पे जियें और करीब आइए

कितने हादसों से गुजरता हूँ रोजकह नहीं सकता
आपका बस एक हादसा हौसला पस्त करेगा क्या

अजनवी आँखें निहारती हैं गोया मैं बच्चा हूँ
सबकी दस्तुरें अच्छी हैंमैं ही केवल कच्चा हूँ

कई हिस्सों में बँटी हैं साँसें, कुछ गीली कुछ सूखी हैं
कभी पलक पर बूँदें हैं और कभी आँख भी रुखी हैं

हया गयीशरम गयीगया आँख का पानी
रेल के डिब्बे भी कहते रोज बेहया कहानी

सड़क की नाव इधर नाली में अब डूबी पड़ी है
और आदमी फ़िक्रमंद हैअपनी गली के भाव में 

चल देख दुनिया का तमाशा आजा मेरे संग-संग
यहाँ झोपड़ी वहाँ महल हैसभी जी रहे तंग-तंग
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Thursday, May 28, 2015

चाँद! तुमको क्या मालूम?

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तेरी रोशनी में
नहायी
ये आधी जिंदगी
शीतलता की छाँव में
अनवरत
अनंत विथियों से
सूरज के रथ पर
सवार होकर
संपूर्ण सृष्टि की
एक झलक पाना चाहती है.

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तुम्हारे स्पर्श से
स्पन्दित
ये आधी जिंदगी
घुप्प अंधेरे में
दीपक की लौ के
इर्द-गिर्द, पतंगे की मानिंद,
संपूर्ण मानवता की
खुशी के लिए
एक उज्ज्वल प्रकाश की
तलाश करना चाहती है.

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तुम्हारे होने  से
उल्लासित
यह संपूर्ण जीवन
आशा और निराशा के
मंथन-भंवर से
उत्प्लावित
तेज बहाव में
प्राणपन से जूझता
साँसों का संघर्ष
एक गरिमामयी
सार्थक अर्थ 
तलाश करना चाहता है.

अगर कभी तुमको पता चले
तो मुझे भी बताना
कि मेरा भाव का संसार
कितना छोटा 
किंतु मधुर है.

तुम्हारी धवल रश्मियों से
मेरा अंतरतम प्रफ्फुलित
और प्रसन्न है
जहाँ से क्षितिज के पार का
लोक भी दृश्य है
और धरा की विहंगम
कलायें भी.
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Sunday, May 17, 2015

तुम कौन हो?

अतीत के बिखरे पन्नों पर
इतिहास का अर्थ ढूँढना
अगर इतना दुरूह न होता
तो हर मानव अपनी छवि की
एक सीधी परछाईं होता
जिसका रूप अनंत क्षितिज में
परिचित कल्पना की
एक सुंदर छायावृती होती.

आज हम अपने चेहरे की आकृति
औरों के आईनों में ढूँढने को बेबस है;
और सार्थक को भी निरर्थक मानकर
अपनी आत्मा  को दुत्कार देना
हमारी सहज प्रवृति
जो गूंगी होकर भी उँची आवाज़ में
कुछ इस तरह बोलती है
जैसे तलवार की धार से
लटकती हो लहू की दो बूँद

तब ऐसे में हमसे कोई ये पूछे
की तुम कौन हो?
और किसकी तस्वीर हो?
हमारे पास जवाब के लिए
अब क्या बचा है---
सिर्फ़ दो सजल नेत्र
जो बेजुवान किंतु सार्थक
शब्द बोलते है
जिसकी अपनी भाषा है
और अपनी सीमाएँ.

काश! उनकी भाषा का
संवेदनात्मक पहलू भी
कोई समझ पाता
और अर्थ को अर्थ के सापेक्ष में
मौन समझ जाने की
गहरी अनुभूति होती
तो हम भी
एक क़हक़हे के साथ कहते
कि मेरी पहचान को पहचानने वाला
इस विराट शून्य में कोई तो है
जो इन विसरित बूँदों की वेदनाओं को
आत्मसात कर लेना
अपनी नियति मानता है
और अपने स्व को तिरोहित करके
एक नया इतिहास बनाना
अपना आदर्श!
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, May 08, 2015

मन की अभिलाषा गीत बन गयी

न जाने कौन हमारी खुशी की चुपचाप दुआएँ करता है
असर इतना कि अश्कों को भी हँसी-खुशी से भरता है

न जाने कौन हमारे क्रंदन को भी अपनी दौलत कहता है
असर इतना कि चिथड़ों में भी शहंशाह-सा रहता है

न जाने कौन राह के कांटो को भी चुपके-चुपके चुनता है
असर इतना कि झंझावात में स्वप्न हिंडोले बुनता है

जाने कौन हमारे पन्नों में रोज नया रंग भरता है
असर इतना कि जीवन ही अब इंद्रधनुषी लगता है

न जाने कौन हमारे सपनों को एक कौतूहल-सा गढ़ता है
असर इतना कि साँझ-सबेरे सूरज यहाँ भी चलता है

चल हमें भुलावा देकर ले चल, चाँद जहाँ पर आता है
जीवन उठता-गिरता पथ पर नीरव चैन न पाता है

मन की अभिलाषा गीत बन गयी नयन बन गये हैं अनिमेष
कल की उद्वेलना आज सो गयी और नहीं कुछ रहा शेष
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, April 24, 2015

तलाश

कल जिनके हाथ में मैं फूल देकर आया था
उन्हीं के हाथ से एक शूल की मैं तलाश में हूँ ।

कल जिनके साथ मैं चुपचाप चलकर आया था
उन्हीं के निगाह की एक भूल की मैं तलाश में हूँ ।

इस मुस्कराते चाँद को ढूढो न अपनी चादर में
उसी के हाथ से एक लौ की मैं तलाश में हूँ ।

कल जिनके घर में मैं एक बूँद देकर आया था
उन्हीं के हाथ से सैलाब की मैं तलाश में हूँ ।

टूटे साज का राग मुझे अब भी बहुत रुलाता है
उन्हीं के साज की मृदुल एक राग की मैं तलाश में हूँ ।

जंग लड़ लिया है खुद की जिंदगी से बहुत मैंने
उन्हीं के हाथ से एक दुआ की मैं तलाश में हूँ ।

ख्वाहिश फकत है बाकी कि जिस दर्द को जिया मिलकर
उन्हीं के पाक--रूह की मैं आज भी तलाश में हूँ 
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, September 16, 2013

एक शिक्षक की चाह

सुबह की किरणें रोज़ नई उम्मीद जगाती हैं. परंतु शाम ढलते-ढलते ऐसा प्रतीत होने लगता है मानों समुद्र के रेत पर बना बच्चों का घरौंदा लहरों में विलीन होने लगा हैउम्मीद की लकीरें रोज़ उभरती हैं और रोज़ धूंध में समा जाती हैहर दिन एक नई जिंदगी जीता हूँ  और हर रात इसे दफ़न करता हूँजिस दिन ज़बरदस्ती नयेपन का एहसास किया, मन  का पुराना भूत घुमड़ता हुआ प्रेस रिपोर्टर की नाईं घेर लेता है. निरुत्तर होकर एकांत साधना के सिवा उपचार नहीं बचता.

 मैं एक शिक्षक हूँबच्चों का उनके उन्नति क्रम में मार्गदर्शन करना मेरा धर्म है. रोज सुबह यह सोँचकर स्कूल जाता हूँ कि आज कुछ खास करके लौटूँगापर जो सोचता हूँ, वह कर नहीं पाता और जो करता हूँ उसे सोचा नहीं थाजिस दिन मन की कर लिया, उस दिन बेचैन आत्मा गहरी सांस के साथ  राहत महसूस करती हैपर ऐसा हर रोज़ नहीं होताजब भी बच्चों के साथ उनकी कक्षा में होता हूँ, लगता है अपने दिमाग़ के तंतुओं को उनके दिमाग़ के साथ जोड़ दूं.   भौतिक रूप से पर ऐसा संभव नहींकुछ सजग छात्रों को छोड़ दें, तो शेष की आँखों में एक शून्यता  का भाव मुझे विचलित करता है.  चाहता हूँ कि उनके ज्ञान की सीमाओं को विस्तृत कर दूंचाहता हूँ कि उनकी संवेदनाओं को कुरेदकर उसमें अपनी मुखरता की कुछ उर्बरा डाल दूंचाहता हूँ कि उनके उड़ान की सीमाओं को फिर से परिभाषित करूँचाहता ये भी हूँ कि उनके दुर्गुणों को नीलकंठ की भाँति पी जाऊँ.  काश, मैं ऐसा कर पाता !  इन विचारों का बोध ही पीड़ादाई बन गयी है.

दिन दिन निरर्थका में बीतता जा रहा हैअगर कुछ सार्थक होता भी है तो वो दूसरे समझते हैंमैं नहींहमारी समझ तो बदली की ओट में समाई हुई सी लगती है.

 कभी किसी ने हमें अगर सराह दिया तो आखों पर कलई चढ़ जाती है और आलोचना पर आत्मा विवेचना करने लगता हूँये मानव की कमज़ोरी हैऔर मैं कोई महमानव तो हूँ नहींमैं भी उसी प्रजाति का एक हिस्सा हूँ जिसके दो आँख, एक अन्वेषी  मस्तिष्क और एक रक्ताभ हृदय हैइसकी धमनियों में रक्त संचार भी होता है.  

हाय रे मानव ! मारता है तो विद्रोह से और मरता है तो आँखें मूंदकर !  तेरी विवेचना समझ और शब्दों से परे है.

हमारे मित्र ने एक सुबह अपनी साफ़गोई में स्वयं को सहृदय और निश्छल जताने की भरपूर कोशिश कीमैने उनसे सहृदयता और निश्च्छालता को मापने का पैमाना पूछ लिया. उनका अपना तर्क था और मेरी अपनी दलीलहाँ, हम दोनो समझदार थे सो तर्क-कुतर्क बक्से में बंद करके अपनी- अपनी राह ली  जैसे दो भैंसे आमने-सामने आने पर पहले उपर सिर उठाकर आँखें तरेरते हैं, पैर खुरचते हैं और फिर  एक दूसरे की ताक़त का अंदाज़ा लगा लेते हैं. और अगर भाँप लिया की प्रतिद्वन्द्वी बराबरी का है तो विपरीत दिशा की ओर रुख़ कर लेते हैंइस प्रसंग का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ.  हम दोनों अगले दिन उसी गर्मजोशी से मिले जैसे कल कुछ हुआ ही न था.

जो मन कहता है वह कर नहीं पाता और जो करता जा रहा हूँ उसे मन स्वीकारता  नहीं. दोनों में सामन्जस्य बिठाना चुंबक के उत्तरी और उत्तरी ध्रुब को पास रखने जैसा हो गया है.  

इन दिनों मन में एक अपराध  बोध जैसा गहरा जख्म बनता जा रहा है.  ये ज़ख्म धर्म, कर्म और मन के अन्तर्द्वन्द्व की उपज हैइसकी जड़ धीरे-धीरे गहरी होती  जा रही हैऔर मैं बेबसकुछ भी सार्थक कर सकने में विवश ! 

विवशता बहुत बड़ा शाप है. इससे मुक्ति के लिए शायद दधिचि की हड्डियाँ चाहिए. और मैं वो कहाँ से लाउँ ? इसका प्रयोग तो  देवों ने पहले ही कर लिया है.

बस इसी उम्मीद में जिए जा रहा हूँ कि कल की काल्पनिक सुबह कुछ नएपन का भान कराएगी और एक सुखद बदलाव होगा.  

ये उम्मीद ही अब हमारी धरोहर हैऔर मैं इसका रक्षक !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा