Thursday, September 10, 2015

चल देख दुनिया का तमाशा


जिंदगी की राह जब हो जाए गर कभी कठिन
तो टूटते तारों में फिर से कोई रंग ढूंढीए

राह किसी मोड़ पर जब अर्थ बदलने लगे
पत्थर  फेंको भंवर में कि डूब जाएँगे

जिंदगी जिस दिन मुझे चौराहे पर सोयी मिली
हाथ का मशाल तब से और तेज जल गया

दस्तक हुई या तीर चला ये तो बताइए
आपके रहमत पे जियें और करीब आइए

कितने हादसों से गुजरता हूँ रोजकह नहीं सकता
आपका बस एक हादसा हौसला पस्त करेगा क्या

अजनवी आँखें निहारती हैं गोया मैं बच्चा हूँ
सबकी दस्तुरें अच्छी हैंमैं ही केवल कच्चा हूँ

कई हिस्सों में बँटी हैं साँसें, कुछ गीली कुछ सूखी हैं
कभी पलक पर बूँदें हैं और कभी आँख भी रुखी हैं

हया गयीशरम गयीगया आँख का पानी
रेल के डिब्बे भी कहते रोज बेहया कहानी

सड़क की नाव इधर नाली में अब डूबी पड़ी है
और आदमी फ़िक्रमंद हैअपनी गली के भाव में 

चल देख दुनिया का तमाशा आजा मेरे संग-संग
यहाँ झोपड़ी वहाँ महल हैसभी जी रहे तंग-तंग
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Thursday, May 28, 2015

चाँद! तुमको क्या मालूम?

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तेरी रोशनी में
नहायी
ये आधी जिंदगी
शीतलता की छाँव में
अनवरत
अनंत विथियों से
सूरज के रथ पर
सवार होकर
संपूर्ण सृष्टि की
एक झलक पाना चाहती है.

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तुम्हारे स्पर्श से
स्पन्दित
ये आधी जिंदगी
घुप्प अंधेरे में
दीपक की लौ के
इर्द-गिर्द, पतंगे की मानिंद,
संपूर्ण मानवता की
खुशी के लिए
एक उज्ज्वल प्रकाश की
तलाश करना चाहती है.

चाँद! तुमको क्या मालूम
कि तुम्हारे होने  से
उल्लासित
यह संपूर्ण जीवन
आशा और निराशा के
मंथन-भंवर से
उत्प्लावित
तेज बहाव में
प्राणपन से जूझता
साँसों का संघर्ष
एक गरिमामयी
सार्थक अर्थ 
तलाश करना चाहता है.

अगर कभी तुमको पता चले
तो मुझे भी बताना
कि मेरा भाव का संसार
कितना छोटा 
किंतु मधुर है.

तुम्हारी धवल रश्मियों से
मेरा अंतरतम प्रफ्फुलित
और प्रसन्न है
जहाँ से क्षितिज के पार का
लोक भी दृश्य है
और धरा की विहंगम
कलायें भी.
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Sunday, May 17, 2015

तुम कौन हो?

अतीत के बिखरे पन्नों पर
इतिहास का अर्थ ढूँढना
अगर इतना दुरूह न होता
तो हर मानव अपनी छवि की
एक सीधी परछाईं होता
जिसका रूप अनंत क्षितिज में
परिचित कल्पना की
एक सुंदर छायावृती होती.

आज हम अपने चेहरे की आकृति
औरों के आईनों में ढूँढने को बेबस है;
और सार्थक को भी निरर्थक मानकर
अपनी आत्मा  को दुत्कार देना
हमारी सहज प्रवृति
जो गूंगी होकर भी उँची आवाज़ में
कुछ इस तरह बोलती है
जैसे तलवार की धार से
लटकती हो लहू की दो बूँद

तब ऐसे में हमसे कोई ये पूछे
की तुम कौन हो?
और किसकी तस्वीर हो?
हमारे पास जवाब के लिए
अब क्या बचा है---
सिर्फ़ दो सजल नेत्र
जो बेजुवान किंतु सार्थक
शब्द बोलते है
जिसकी अपनी भाषा है
और अपनी सीमाएँ.

काश! उनकी भाषा का
संवेदनात्मक पहलू भी
कोई समझ पाता
और अर्थ को अर्थ के सापेक्ष में
मौन समझ जाने की
गहरी अनुभूति होती
तो हम भी
एक क़हक़हे के साथ कहते
कि मेरी पहचान को पहचानने वाला
इस विराट शून्य में कोई तो है
जो इन विसरित बूँदों की वेदनाओं को
आत्मसात कर लेना
अपनी नियति मानता है
और अपने स्व को तिरोहित करके
एक नया इतिहास बनाना
अपना आदर्श!
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, May 08, 2015

मन की अभिलाषा गीत बन गयी

न जाने कौन हमारी खुशी की चुपचाप दुआएँ करता है
असर इतना कि अश्कों को भी हँसी-खुशी से भरता है

न जाने कौन हमारे क्रंदन को भी अपनी दौलत कहता है
असर इतना कि चिथड़ों में भी शहंशाह-सा रहता है

न जाने कौन राह के कांटो को भी चुपके-चुपके चुनता है
असर इतना कि झंझावात में स्वप्न हिंडोले बुनता है

जाने कौन हमारे पन्नों में रोज नया रंग भरता है
असर इतना कि जीवन ही अब इंद्रधनुषी लगता है

न जाने कौन हमारे सपनों को एक कौतूहल-सा गढ़ता है
असर इतना कि साँझ-सबेरे सूरज यहाँ भी चलता है

चल हमें भुलावा देकर ले चल, चाँद जहाँ पर आता है
जीवन उठता-गिरता पथ पर नीरव चैन न पाता है

मन की अभिलाषा गीत बन गयी नयन बन गये हैं अनिमेष
कल की उद्वेलना आज सो गयी और नहीं कुछ रहा शेष
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Friday, April 24, 2015

तलाश

कल जिनके हाथ में मैं फूल देकर आया था
उन्हीं के हाथ से एक शूल की मैं तलाश में हूँ ।

कल जिनके साथ मैं चुपचाप चलकर आया था
उन्हीं के निगाह की एक भूल की मैं तलाश में हूँ ।

इस मुस्कराते चाँद को ढूढो न अपनी चादर में
उसी के हाथ से एक लौ की मैं तलाश में हूँ ।

कल जिनके घर में मैं एक बूँद देकर आया था
उन्हीं के हाथ से सैलाब की मैं तलाश में हूँ ।

टूटे साज का राग मुझे अब भी बहुत रुलाता है
उन्हीं के साज की मृदुल एक राग की मैं तलाश में हूँ ।

जंग लड़ लिया है खुद की जिंदगी से बहुत मैंने
उन्हीं के हाथ से एक दुआ की मैं तलाश में हूँ ।

ख्वाहिश फकत है बाकी कि जिस दर्द को जिया मिलकर
उन्हीं के पाक--रूह की मैं आज भी तलाश में हूँ 
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा

Monday, September 16, 2013

एक शिक्षक की चाह

सुबह की किरणें रोज़ नई उम्मीद जगाती हैं. परंतु शाम ढलते-ढलते ऐसा प्रतीत होने लगता है मानों समुद्र के रेत पर बना बच्चों का घरौंदा लहरों में विलीन होने लगा हैउम्मीद की लकीरें रोज़ उभरती हैं और रोज़ धूंध में समा जाती हैहर दिन एक नई जिंदगी जीता हूँ  और हर रात इसे दफ़न करता हूँजिस दिन ज़बरदस्ती नयेपन का एहसास किया, मन  का पुराना भूत घुमड़ता हुआ प्रेस रिपोर्टर की नाईं घेर लेता है. निरुत्तर होकर एकांत साधना के सिवा उपचार नहीं बचता.

 मैं एक शिक्षक हूँबच्चों का उनके उन्नति क्रम में मार्गदर्शन करना मेरा धर्म है. रोज सुबह यह सोँचकर स्कूल जाता हूँ कि आज कुछ खास करके लौटूँगापर जो सोचता हूँ, वह कर नहीं पाता और जो करता हूँ उसे सोचा नहीं थाजिस दिन मन की कर लिया, उस दिन बेचैन आत्मा गहरी सांस के साथ  राहत महसूस करती हैपर ऐसा हर रोज़ नहीं होताजब भी बच्चों के साथ उनकी कक्षा में होता हूँ, लगता है अपने दिमाग़ के तंतुओं को उनके दिमाग़ के साथ जोड़ दूं.   भौतिक रूप से पर ऐसा संभव नहींकुछ सजग छात्रों को छोड़ दें, तो शेष की आँखों में एक शून्यता  का भाव मुझे विचलित करता है.  चाहता हूँ कि उनके ज्ञान की सीमाओं को विस्तृत कर दूंचाहता हूँ कि उनकी संवेदनाओं को कुरेदकर उसमें अपनी मुखरता की कुछ उर्बरा डाल दूंचाहता हूँ कि उनके उड़ान की सीमाओं को फिर से परिभाषित करूँचाहता ये भी हूँ कि उनके दुर्गुणों को नीलकंठ की भाँति पी जाऊँ.  काश, मैं ऐसा कर पाता !  इन विचारों का बोध ही पीड़ादाई बन गयी है.

दिन दिन निरर्थका में बीतता जा रहा हैअगर कुछ सार्थक होता भी है तो वो दूसरे समझते हैंमैं नहींहमारी समझ तो बदली की ओट में समाई हुई सी लगती है.

 कभी किसी ने हमें अगर सराह दिया तो आखों पर कलई चढ़ जाती है और आलोचना पर आत्मा विवेचना करने लगता हूँये मानव की कमज़ोरी हैऔर मैं कोई महमानव तो हूँ नहींमैं भी उसी प्रजाति का एक हिस्सा हूँ जिसके दो आँख, एक अन्वेषी  मस्तिष्क और एक रक्ताभ हृदय हैइसकी धमनियों में रक्त संचार भी होता है.  

हाय रे मानव ! मारता है तो विद्रोह से और मरता है तो आँखें मूंदकर !  तेरी विवेचना समझ और शब्दों से परे है.

हमारे मित्र ने एक सुबह अपनी साफ़गोई में स्वयं को सहृदय और निश्छल जताने की भरपूर कोशिश कीमैने उनसे सहृदयता और निश्च्छालता को मापने का पैमाना पूछ लिया. उनका अपना तर्क था और मेरी अपनी दलीलहाँ, हम दोनो समझदार थे सो तर्क-कुतर्क बक्से में बंद करके अपनी- अपनी राह ली  जैसे दो भैंसे आमने-सामने आने पर पहले उपर सिर उठाकर आँखें तरेरते हैं, पैर खुरचते हैं और फिर  एक दूसरे की ताक़त का अंदाज़ा लगा लेते हैं. और अगर भाँप लिया की प्रतिद्वन्द्वी बराबरी का है तो विपरीत दिशा की ओर रुख़ कर लेते हैंइस प्रसंग का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ.  हम दोनों अगले दिन उसी गर्मजोशी से मिले जैसे कल कुछ हुआ ही न था.

जो मन कहता है वह कर नहीं पाता और जो करता जा रहा हूँ उसे मन स्वीकारता  नहीं. दोनों में सामन्जस्य बिठाना चुंबक के उत्तरी और उत्तरी ध्रुब को पास रखने जैसा हो गया है.  

इन दिनों मन में एक अपराध  बोध जैसा गहरा जख्म बनता जा रहा है.  ये ज़ख्म धर्म, कर्म और मन के अन्तर्द्वन्द्व की उपज हैइसकी जड़ धीरे-धीरे गहरी होती  जा रही हैऔर मैं बेबसकुछ भी सार्थक कर सकने में विवश ! 

विवशता बहुत बड़ा शाप है. इससे मुक्ति के लिए शायद दधिचि की हड्डियाँ चाहिए. और मैं वो कहाँ से लाउँ ? इसका प्रयोग तो  देवों ने पहले ही कर लिया है.

बस इसी उम्मीद में जिए जा रहा हूँ कि कल की काल्पनिक सुबह कुछ नएपन का भान कराएगी और एक सुखद बदलाव होगा.  

ये उम्मीद ही अब हमारी धरोहर हैऔर मैं इसका रक्षक !
..........रचना © मनोज कुमार मिश्रा